🚩‼️जय श्री राम‼️🚩🙏 *हमारा विज्ञान हज़ारों वर्ष पुराना है…**जब हमारे पास घड़ियां नहीं होती थी, जीवन फिर भी चलता था…**उस समय जैविक घड़ी पर आधारित हमारा जीवन होता था और उन्हीं सिद्धांतों पर शरीर की दिनचर्या चला करती थी।* *अब जानिये, क्या है वो हमारे शरीर की जैविक घड़ी..??**महर्षि आयुर्वेद चिकित्सा संस्थान भोपाल के खानदानी नाड़ी वैद्य-वैद्यराज-त्रिगुणाचार्य* बताते हैं कि हमारे शरीर के अंगों का जैविक घड़ी के आधार पर संचालन कैसे होता है…🌿आइए विस्तार से जानते हैं🌿*प्रातः 3 से 5 तक–**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना चाहिये।**इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है।**ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है।**प्रातः 5 से 7 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है।**प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए।**सुबह 7 के बाद जो मल त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।**प्रातः 7 से 9 तक–**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं।**भोजन के बीच – बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।**प्रातः 11 से 1 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आसपास**मध्याह्न– संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है। इस समय तरल पदार्थ ले सकते है, जैसे मट्ठा पी सकते है, दही खा सकते है।*दोपहर 1 से 3 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए।**इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है।**दोपहर 3 से 5 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है।**2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।**शाम 5 से 7 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है। इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए।**शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है। देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।**रात्री 7 से 9 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है। इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है।**अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है। आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।**रात्री 9 से 11 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है। यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।**रात्री 11 से 1 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है।**इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा, नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है।**इस समय नई कोशिकाएं बनती है।**रात्री 1 से 3 तक-**इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है। अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है। इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।* *ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल बर्बाद हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।**त्रिगुणाचार्य जी का कहना है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।**शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें।**इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं।**देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं।**अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।**आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है।**हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा।**इस प्रकार थोड़ी सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।*🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅🔅 🙏

हमारा विज्ञान हज़ारों वर्ष पुराना है…
जब हमारे पास घड़ियां नहीं होती थी, जीवन फिर भी चलता था…
उस समय जैविक घड़ी पर आधारित हमारा जीवन होता था और उन्हीं सिद्धांतों पर शरीर की दिनचर्या चला करती थी।
अब जानिये, क्या है वो हमारे शरीर की जैविक घड़ी..??
महर्षि आयुर्वेद चिकित्सा संस्थान भोपाल के खानदानी नाड़ी वैद्य-वैद्यराज-त्रिगुणाचार्य बताते हैं कि हमारे शरीर के अंगों का जैविक घड़ी के आधार पर संचालन कैसे होता है…
🌿आइए विस्तार से जानते हैं🌿
प्रातः 3 से 5 तक–
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना चाहिये।
इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है।
ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है।
प्रातः 5 से 7 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है।
प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए।
सुबह 7 के बाद जो मल त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रातः 7 से 9 तक–
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं।
भोजन के बीच – बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।
प्रातः 11 से 1 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आसपास
*मध्याह्न– संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है। इस समय तरल पदार्थ ले सकते है, जैसे मट्ठा पी सकते है, दही खा सकते है।
दोपहर 1 से 3 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए।
इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है।
दोपहर 3 से 5 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है।
2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।
शाम 5 से 7 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है। इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए।
शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है। देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।
रात्री 7 से 9 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है। इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है।
अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है। आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।
रात्री 9 से 11 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है। यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
रात्री 11 से 1 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है।
इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा, नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है।
इस समय नई कोशिकाएं बनती है।
रात्री 1 से 3 तक-
इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है। अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है। इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।
ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल बर्बाद हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।
त्रिगुणाचार्य जी का कहना है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।
शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें।
इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं।
देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं।
अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।
आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है।
हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा।
इस प्रकार थोड़ी सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।
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